Friday, July 21, 2006

सहारे की आबरु क्या,वजूद क्या
ख्वाब क्या, उम्मीद क्या,
जिसका होना बीते खोने के दरमिया,
ऊसकी हैसियत क्या, शक्सियत क्या,
किसी के सफर का नही इत्तिका
ऊसका सफर क्या, मुकाम क्या,
जो किसी के हद-ए-ख्याल मे रुबरु ना,
वो हैरान क्या, परेशान क्या !

Saturday, February 25, 2006

जोकर करे ना जोकरी चँहु मौसम काहे,
निरन्तर जो करत रहे, पागल ना कहलाए?

Friday, January 06, 2006

कुछ बूँदो को

दो पँक़्तियो को जीवन सार ना समझ लेना,
कुछ बूँदो को आबक्षार ना समझ लेना

लोग है यहाँ ऊथले कई
खडे है यहाँ पूतले कई,
और जो जमीन मे गडे है,
उन पर तो पत्थर पडे है

रहने वाले ऊचाई के मचान के,
करते गहराई के बयान है
दो वचनो को ललकार ना समझ लेना,
कुछ बूँदो को आबक्षार ना समझ लेना

Thursday, December 29, 2005

अधूरा नशा

गिरा न देना मेरे वस्त्रो पर तुम सुरा,
तुम्हारा भी नशा रह जाएगा अधूरा,
मै जाम मे बह जाउँगा,
एक पल मे ढह् जाउँगा

दोषी मदिरा को न ठहरा देना,
मय अनुभव का भागी बन, मै ही न विराम पाउँगा
कर प्याले को गलत न देना,
छाले कर के है प्याले से, मै ही न थाम पाउँगा

यादे सुबह तक तुम खो दोगी,
मदिरा वस्त्रो पर मेरे रह जाएगी,
छलकी जाम की तरह गुम होगी,
महक मेरे साथ रह जाएगी

गिरा न देना मेरे वस्त्रो पर तुम सुरा,
तुम्हारा भी नशा रह जाएगा अधूरा

Thursday, December 15, 2005

मदिरालय

आज बदला सा था माहौल मदिरालय का,
हवा मे निशान था विचित्र प्रलय का,
दर्द था लावारीस, हर पग प्रणव आलय था,
आज मेला जीने वालो का था,
दिवस पीने वालो का था,
लोक आनन्द समाहित हर घूँट, नशा बाकी न था,
आज कर लिया मदिरापान साकी ने था

Wednesday, December 07, 2005

कभी

मतलब के जीवन का क्षण ले
कभी खोज जीवन का अर्थ ले,
अपना बना लेने वालो को ले,
और कभी अपना बना ले,
कभी आप को खो कर किसी को पा ले,
कभी जीत को परे हटा ले,
कभी हार का उत्सव मना ले

हर पल बीतेगा जीवन क्रिया के हल मे,
बस जा कभी जीवन पशचात के पल मे,
पाने के हिसाब मे है प्रमाण लगा,
कभी खोये का अनुमान लगा

Tuesday, December 06, 2005

मौसम

आज सर्द हवा ने जिगर मे दर्द को सहला दिया,
थोडे से पानी ने ऊन मे लिपटी काया को जला दिया,
बर्फ के हर कतरे ने लबो को सूखा दिया
मेरे घर की छवि ने मेरा आसरा भूला दिया

Sunday, December 04, 2005

रहस्य

खोना अनायास,
हरसम्भव प्रयास,
दूरी जटिल,
व्यवहार कुटिल,
वो पल विकराल,
विचारो का जाल,
अनन्य वर्तमान,
दूर्लभ सम्मान,
न भूत, न भविष्य,
परिष्क्रत जीवन रहस्य

Monday, November 28, 2005

ढाई आखर

कोरा कागज ले मैने लिखे थे आखर ढाई
कागज ने धार से फिर चीर एसे लगाई
लहु बहा कागज पर स्याही सा, पर कागज पर न टिकी एक बूँद
आखर ढाई लिखे रह गए, पर कागज ने कलम से ली अँखिया मूँद

Saturday, November 26, 2005

रात का कोहरा

माना एक अरसा आस जगाता होगा,
कुछ बदल भी जाता होगा,
एक नया दिन होता होगा,
पर रात का कोहरा तो रहता होगा,
अन्तर को एक ठिठुरन तो देता होगा

Thursday, November 24, 2005

This is not mine but its neat.

Jo duniya hoy kalo naag, to hu pan madaari chhu,
Pachhadu udta pankhi ne evo hu shikari chhu.
Chhu badshah betaaj aa aakhiye aalm no,
chhtay aapni ek mithi najar kaaje bhikhari chhu.

ठहरा मुकाम

कभी राह तकते मुकाम निकल जाए
कभी मुकाम देखते राह भटक जाए

पर राह के खातिर मुकाम जो बदल ले

तो राही पथ का हो जाए,
मुकाम राह देखता रह जाए,

पर ए राही, समय बदल ले, तारतम्य बदल ले

मुकाम तो तेरे लिए फिर ठहरा रह जाए,
पलटने का साहस ज़ो तेरे मे आ जाए

Tuesday, November 22, 2005

वृक्ष का बल

कल एक लता ने धरा पर घर कर लिया,
लता पनप गई और आज वृक्ष सिमट गया,
तना वृक्ष का देता था लता को सम्बल,
पर क्या लता मे समाहित था वृक्ष का बल ?

Friday, November 18, 2005

खोज

निकला आज राहो मे,
अस्तित्व कि खोज मे,
फिर आज शुन्य से रुबरु मै था,
मेरा वजूद तेरे परिचय से था

शक्ल बदली या आईने बदल गये,
प्यादे बदले या नियम बदल गये,
रफ्तार बदली या विराम बदल गये,
मेरे होने के मायने बदल गये

Monday, November 14, 2005

ये कौन जाने ?

रात के काले परदे गिर गए
आँखो के कोने फिर से भर गए
आज बुँदे गिरे या नही कौन जाने ?
हृदय के तार हिले या नही कौन जाने ?
कल का आलम क्या होगा कौन जाने ?
बस यह हाल फिर होगा,
हर सवाल फिर होगा,
अरमानो का कत्लेआम फिर होगा,
जाने या अनजाने ये कौन जाने ?

थामे रहे

थामे रहे कशती औरो कि, अपना समझ कर
आया तुफान, ठहरे रहे मझधार मे रह कर
साहसी थे या नादान, शायद इसलिए रुके थे
धकेल कर, तुम किनारे जब चले थे

Saturday, November 05, 2005

शाम एक मन्दिर नित जाता था, आज भगवान उठ गये
मदिरालय का मुझे रास्ता पता था, आज कदम उठ गये

Friday, November 04, 2005

हम फिर वही पर सामन्जस्य बदल गया
रेत फिर वही पर सागर बदल गया
कल के निशानो पर आज की रेखा
कल के ताप पर आज की हवा
कल के पट पर आज का चित्र
क्या वक़्त रुकेगा या जीवन का समीकरण बद्ल गया ?

Monday, October 31, 2005

माना जिन्दगी मे तेरी जगह नही मेरे लिए, बस दर के बाहर रुक जाने दे,
समय का अगला झोका धकेल देगा, बस संभल भर जाने दे
क्षण मे क्षीण हुआ बल मेरा ना जाने क्यो,
कुछ नया नही, पर इस बार समझ कर जाने दे
उम्र गुज्ररी ढूडने मे वोह चन्द लोग जो बाद मरने के मेरे रोऍ
मलाल ये की बाद मेरे, मेरी जिन्दगी पर वोह सब रोऍ