Friday, November 04, 2005

हम फिर वही पर सामन्जस्य बदल गया
रेत फिर वही पर सागर बदल गया
कल के निशानो पर आज की रेखा
कल के ताप पर आज की हवा
कल के पट पर आज का चित्र
क्या वक़्त रुकेगा या जीवन का समीकरण बद्ल गया ?

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